तुम होकर भी नहीं हो

plachy

उस अधूरे लक्ष्य की ओर कदम तो बढ़े,
पर आँखें खुली तो सपने टूटे.
कि जहा हम थे खड़े
वहाँ से ग़लतफहमी के बादल हटे.

हम दोनो उस किताब का हिस्सा तो थे,
पर तुम्हारा हमारे पन्ने तक का सफ़र कहा मुमकिन था.
तुम हमारे दिल का अटूट हिस्सा तो थे,
पर तुम्हारा – हमारा मिलना भी खुदा को कहाँ मंज़ूर था.

आज भी दिल करता है तुम्हें एक टक देखती रहूँ,
पर जब तुम आँखों मे आँखें डाल कर देखो तो नज़रे झुका लूँ.
तुम्हें वो हमारी ज़िंदगी की अनकही ग़ज़ले सुनाऊ जो कभी किसी से ना कहूँ,
और जब तुम मुड़कर जाओ तो तुम्हारी आँखों मे उनकी छाप देखूँ .

तुम्हारे कुछ कह देने पर सारी रात करवटें बदलूँ,
और तुम्हें ही गले लगाकर तुम्हारी ही शिकायत करूँ.
कैसे हमारी हर अनकही बात तुम समझ जाते थे,
कभी बाप की तरह सहलाते तो कभी दोस्त की तरह छेड़ देते थे.

तुम डाट देते थे तो लगता था तुम हो ,
तुम टोक देते थे तो लगता था अपने साँचे मे ढाल रहे हो.
हर लड़ाई के बाद जब अश्क बहते,
तो तुम कहते धागे मे गाँठ पड़ भी जाए तो दोनो सिरे और पास आ जाते .

तुम डरते थे दो साल बाद साथ छूटे तो कही हाथ न छूट जाए,
अपने आप को खींचते थे.
तुम ऐसे हमारे ज़हन मे छाए,
तुम क्या जानो कि हम तो दो पल मे भी ज़िंदगी गुज़ार लेते थे.

हाँ हम जानते हैं कि वक़्त ने तुम्हारा साथ कभी नही दिया,
पर हमारा हाथ थाम कर तो देखा होता ना,
हमारे लिए तो दोस्ती खुदा का पैगाम बनकर आया,
पर आसान नही था उन आँखो पर दोस्ती का नकाब पहनना.

अब भी जब सोचती हूँ कि तुम आज हो कल नहीं,
तो रूह काँप उठती है, आँखे भर आती है.
तुम पहली बारिश की तरह आए नहीं,
कि आँखो मे बूँदों की तरह समाए.

हम तुम हमनवा तो थे,
पर हमसफ़र शायद कभी नही थे.
कैसे बताए की हर धूप मे तुम छाव थे,
जुदा तुमसे फिर कैसे रह पाते थे.

तुम्हारे स्पर्श ने मानो हमे बदल सा दिया,
पारस थे तुम जो पीतल भी सोना बन गया.
दुनियादारी से अंजान हम,
जैसे मिटा दिए तुमने सारे गम.

सोचा था चल देंगे उल्टे पाओ,
नही पता था ज़िंदगी ने जो राह पकड़ी है उसपे मुड़ा नही जा सकता.
दिल चाहता था कि तुम साथ आओ,
पर हम जानते थे वो मुमकिन नही था.

सुबह तुम्हारे नाम की मुस्कान,
शाम को बारिश की बूँदो मे तुम दिखते.
नींद भरी आँखो से तुम्हारी दुआ होती,
सपनो मे तुम्हें खोने का डर होता.

वापस ला दो वो मुस्कान जो बिन चाहे ही आ जाती ,
वो पलकों का भारी हो जाना जब तुम रोते,
वो रातें जो यूँ ही जाग लिए हम,
वो यादें जो बिन बोले ही बुन लिए हम.

तुम्हारी गलतियों को तुम्हें अपना समझकर माफ़ किया है,
हर टकरार मे तुम्हे बुरा ना लगे उस बात का ख़्याल रखा है.
हमारी गलतियो पर रोए हैं,
और तुम्हे समझने का वादा किया है.

कभी कुछ नहीं चाहा तुमसे,
पर तुम्हारी खुशियों को अपनी ज़िम्मेदारी और गम को अपना माना है.
कभी माँग कर तो देखा होता,
हमने तो अपनी रूह भी तुम्हारे नाम कर रखी है.

हम कहीं भी जाए तुम्हारी छाप रह जाएगी,
दिन रात का साथ रह जाएगा.
सोचते हैं कि जहाँ दो पल ना गुज़रते थे तुम बिन,
वाहा पूरी ज़िंदगी क्या गुज़ारेंगे ?

कभी समय निकाल कर आना तुमसे बहुत से सवालात करने है,
कैसे भाप लेते थे कि हम रोए हैं,
कैसे जान लेते थे कि तुमसे गुस्सा हैं,
कैसे मान लेते थे कि किसी बात से खफा है?

हम तुम जग से बेख़बर थे,
रिश्ते का नाम माँगा था लोगो ने,
तुम बोले वो मेरी दोस्त है,
हम बोले वो हुमारा खुदा है.

स्वाभिमान -अभिमान से बढ़कर थे तुम मेरे,
मेरे लिए खुदा थे तुम मेरे.
जो मैं कभी ना बन पाऊँगी तुम्हारे लिए,
तुम वो थे मेरे लिए.

अगली बार थोड़ा लंबा वक़्त लेकर आना,
मेरा थोड़ा और साथ दे जाना.
ज़्यादा नही बस इतनी सी ख्वाइश है,
कि अपनी पूरी ज़िंदगी हमारे नाम कर जाना.

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